बहुत से लोग यह मानते हैं कि पुलिस को FIR दर्ज करने से पहले 10 दिन का समय मिलता है, लेकिन वास्तव में कानून में ऐसा कोई नियम नहीं है। नए आपराधिक कानून ढांचे, यानी Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS) और Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) प्रावधान के अनुसार यदि किसी शिकायत से cognizable offence स्पष्ट होता है तो पुलिस के लिए तुरंत FIR दर्ज करना अनिवार्य है। FIR दर्ज करने में अनावश्यक देरी करना कानूनी कर्तव्य का उल्लंघन माना जाता है।
हालांकि कुछ सीमित परिस्थितियों में पुलिस प्रारंभिक जांच (preliminary inquiry) कर सकती है। जैसे कि परिवारिक विवाद, व्यापार या पैसों से जुड़े विवाद, मेडिकल लापरवाही के आरोप, भ्रष्टाचार के मामले, या ऐसे मामले जिनकी शिकायत काफी देर से की गई हो। इस प्रारंभिक जांच का उद्देश्य सिर्फ यह देखना होता है कि क्या शिकायत में वास्तव में कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जांच अनिश्चित समय तक नहीं चल सकती और आमतौर पर लगभग 7 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
यह सिद्धांत भारत के सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध फैसले Lalita Kumari बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013) में स्पष्ट रूप से तय किया गया था, जिसमें अदालत ने कहा कि यदि सूचना से संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो पुलिस के पास FIR दर्ज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता।
इसलिए नागरिकों के लिए अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी होना बहुत जरूरी है। यदि पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार करती है या अनावश्यक देरी करती है, तो शिकायतकर्ता Superintendent of Police (SP) को लिखित शिकायत दे सकता है या मजिस्ट्रेट की अदालत में जाकर FIR दर्ज कराने के लिए आदेश प्राप्त कर सकता है।

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